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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, "बिना तलाक लिए लिव-इन में नहीं रह सकते, नहीं मिलेगी कानूनी सुरक्षा"

 Edited By: Malaika Imam @MalaikaImam1
 Published : Mar 29, 2026 07:13 am IST,  Updated : Mar 29, 2026 07:18 am IST

लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले शादीशुदा लोगों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा महिला और पुरुष अपने पति या पत्नी के जीवित रहते हुए उनसे तलाक लिए बगैर किसी तीसरे व्यक्ति के साथ कानूनी रूप से लिव इन संबंध में नहीं रह सकते।

प्रतीकात्मक फोटो- India TV Hindi
प्रतीकात्मक फोटो Image Source : FILE (PTI)

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादीशुदा महिला और पुरुष अपने पति या पत्नी के जीवित रहते हुए उनसे तलाक लिए बगैर किसी तीसरे व्यक्ति के साथ कानूनी रूप से लिव इन संबंध में नहीं रह सकते। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने अंजू और उनके साथी द्वारा दायर एक याचिका को निस्तारित करते हुए यह टिप्पणी की।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने कहा कि सक्षम अदालत से तलाक हासिल किए बिना कोर्ट लिव-इन संबंध में रहने वाले याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई रिट या निर्देश जारी नहीं कर सकता है। बहरहाल, अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता परेशान हैं या उन्हें किसी प्रकार की हिंसा की आशंका है तो वे एक विस्तृत प्रार्थना पत्र देकर संबंधित पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकते हैं और संबंधित अधिकारी प्रार्थना पत्र की विषय वस्तु की जांच कर याचिकाकर्ताओं के जीवन की सुरक्षा के लिए कानून के मुताबिक आवश्यक कार्रवाई करेगा।

याचिकाकर्ता पहले से ही शादीशुदा 

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुहार लगाई थी कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और उन्हें अपनी जान का खतरा है, इसलिए पुलिस और विपक्षियों को उनके "शांतिपूर्ण जीवन" में दखल न देने का निर्देश दिया जाए। सरकारी अधिवक्ता ने दलील दी कि दोनों याचिकाकर्ता पहले से ही शादीशुदा हैं। बिना तलाक के उनका साथ रहना न केवल 'अवैध' है बल्कि सामाजिक और कानूनी मर्यादाओं के भी खिलाफ है।

इस पर अदालत ने कहा, "ऐसी स्थिति में लिव-इन संबंध में होने का दावा करने वाले इन याचिकाकर्ताओं को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुए सुरक्षा नहीं दी जा सकती।" अदालत ने 20 मार्च को दिए अपने निर्णय में कहा, "दो वयस्क व्यक्तियों की निजी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को भी नहीं है और उनके माता-पिता तक उनके संबंधों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। लेकिन, स्वतंत्रता का अधिकार या निजी स्वतंत्रता का अधिकार अपने आप में पूर्ण नहीं है, बल्कि इस पर कुछ पाबंदियां भी लागू होती हैं।"

"एक की स्वतंत्रता, दूसरे का अधिकार"

अदालत ने कहा, "एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां खत्म हो जाती है जहां दूसरे व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार प्रारंभ होता है। एक पति या पत्नी को अपने जीवन साथी के साथ रहने का कानूनी अधिकार है और निजी स्वतंत्रता के नाम पर उसे उसके इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।" अदालत ने कहा, "यह स्थापित कानून है कि कानून के उलट या दंडात्मक प्रावधान सहित एक कानूनी प्रावधान को विफल करने के लिए निर्देश जारी नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं को कानूनी रूप से सुरक्षा पाने के लिए निर्देश जारी करने की मांग करने का अधिकार नहीं है।"

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